Monday, 14 August 2017

इन चुप्पियों के समन्दरों में...

चुप है हवाएँ ,
चुप है धरती ,
चुप ही है आसमान ,
और
चुप से  हैं
उड़ाने भरते पंछी...

पसरी है
दूर तलक चुप्पियाँ।

इन घुटन भरी
 चुप्पियों के समन्दरों में.
छिपे हैं,
जाने कितने ही ज्वार...

 और
छुपी है
कितनी ही
बरसने को आतुर
घुटी -घुटी सी घटाएं...


Wednesday, 8 March 2017

एक दिन

एक दिन
थम गई थी
घूमते-घूमते
जब धरा,

उस दिन
रुक गई थी
सहसा ही
चलते-चलते
जब हवा,

उसी दिन ही
सिमटा सा लगा
दूर तक फैला ,
आसमां..

ऐसे खामोश
थमे,रुके, सिमटे
जहां में
वह कैसा जलजला था ,
डगमगाए जाता था
मुझे...

शायद
स्पंदन थी
मेरे ह्रदय की
जो कंपन बनी थी
या कुछ और था..!


Tuesday, 17 January 2017

ਜਿਵੇਂ ਨਿੱਕੇ -ਨਿੱਕੇ ਆਲ੍ਹਣੇ ( जैसे छोटे -छोटे कोटर )

ਇੱਕ ਮਨ ਦੇ ਵਿੱਚ
ਕਈ ਸਾਰੇ  ਮਨ ,
ਜਿਵੇਂ
ਨਿੱਕੇ -ਨਿੱਕੇ
ਆਲ੍ਹਣੇ।

ਹਰੇਕ ਮਨ ਦੇ
ਨਿਆਰੇ -ਨਿਆਰੇ
ਠੋਰ -ਠਿਕਾਣੇ।

ਇਕ ਮਨ ਕਹਿੰਦਾ
ਥੋੜਾ ਜਿਹਾ
ਹੰਸ ਵੀ ਲਿਆ ਕਰ।

ਦੂਜਾ ਮਨ
ਬੋਲ ਪੈਂਦਾ ਹੈ ,
ਮੇਰਾ ਪੱਲਾ ਫੜੂ ਕੇ

ਕੀ ਰੱਖੀਆ ਹੈ
ਦੁਨੀਆ ਦੇ
ਹਾਸੇ ਚ ,
ਝੁੱਟੀ  ਦੁਨੀਆ ਹੈ
ਤੇ ਝੂੱਟੇ ਹੈ
ਇਸਦੇ ਹਾਸੇ।

ਇੱਕ ਮਨ ਚ
ਇਕ ਛੋਟਾ ਜਿਹਾ
ਦੀਵਾ ਜੱਗਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ
ਇੱਕ ਆਸ ਦਾ,
ਉੱਮੀਦ ਦਾ,
ਭਾਵੇਂ ਝੁੱਟੀ ਹੀ ਹੋਵੇਂ।

ਇੱਕ ਮਨ
ਸਿਆਹੀ ਵਾਂਗ
ਜਿਸ ਵਿੱਚ
ਅੰਧਿਆਰਾ ਭਰਿਆ ਹੈ।

ਮਨ ਦੇ
ਇੰਨਾ ਆਲ੍ਹਣਿਆਂ ਚ
ਵੜਦੇ  - ਨਿੱਕਲਦੇ,
ਦੁਨੀਆ ਦੇ
ਹਾਸੇ -ਉਦਾਸੀਆਂ ਦੀ
ਗਹਿਰਾਈ ਵਿੱਚ
ਡੁੱਬਦੇ -ਪਾਰ ਉੱਤਰਦੇ ਹੀ
  ਜਿੰਦਗੀ ਬਤੀਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ।


एक मन में
कई सारे मन है
जैसे छोटे -छोटे
कोटर।

हर मन के
अलग-अलग
ठौर -ठिकाने।

एक मन कहता है
थोड़ा खुश भी
 रहा करो

दूसरा मन
बोल पड़ता है
मेरा पल्ला थाम

क्या रखा है
 दुनिया की
 ख़ुशी में
झूठी दुनिया है
और झूठी ही खुशियां।

एक मन में
एक छोटा सा दीया जलता है
आशा का
उम्मीद का
चाहे झूठी ही सही।

एक मन
काली सियाही लिए
जैसे रात का अँधियारा।

मन के
इन कोटरों में
रहते - निकलते ,
दुनियां की
खुशियों -उदासियों की
गहराइयों में
डूबते - पार उतरते ही
जीवन व्यतीत होता जाता है।


Sunday, 25 December 2016

प्रेम तुम कहीं नहीं हो

प्रेम तुम,
छद्म रूप हो
माया हो
मोह हो
मरीचिका हो,

ना नज़र
आने वाली
अप्राप्य वस्तु से हो

मुट्ठी में बंद
रेत  से  हो
फिसलते जाते हो
 पल-पल,

पतझड़ के
गिरते पत्ते की
 तरह हो

जाड़े की धूप
जैसे हो
बिना गर्माहट लिए,

प्रेम तुम ,
कुछ भी हो सकते हो
बस
ख़ुशी नहीं हो सकते,

निराशा हो
आँखों की धुंधली होती
चमक की तरह.

प्रेम तुम
कहीं नहीं हो,
अगर हो तो
बस मृत्यु पथ पर ही।



Friday, 9 December 2016

मेरी यह जिन्दगी तुम से ही तो खूबसूरत है ...

शुक्रिया जिंदगी ,
पल-पल
साथ देने को ,
चाहे कभी तुम भ्रम हो
 कभी सत्य।

नज़र आती हो
धुंध के धुँधलके में
कभी परछाई सी।

बढ़ती हूँ तेरी और
बढ़ाते हुए
धीमे -धीमे कदम ,
गुम हो जाती हो
भ्रम सी।

फिर भी जिंदगी
खूबसूरत हो तुम !

क्या फर्क है
तुम जिन्दगी हो
 या
तुम्हारा नाम जिन्दगी है।

चाहे तुम भ्रम ही
 क्यूँ ना हो ,
मेरी यह जिन्दगी
तुम से ही तो
 खूबसूरत है !



Tuesday, 29 November 2016

ਜਿਵੇਂ ਪੱਤਝੜ ਦਾ ਰੁੱਖ

ਮਨ ਪੰਛੀ
ਲੱਭਦਾ ਰਿਹਾ
ਇਕ ਠਿਕਾਣਾ।

ਬਣਾਉਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਸੀ
ਇਕ ਛੋਟਾ ਜਿਹਾ ਆਲਣਾ
ਤੇਰੇ ਮਨ ਵਿੱਚ। 

ਭਟਕਦਾ ਰਿਹਾ 
ਇੱਧਰ -ਉੱਧਰ 
ਤਰਸਦਾ ਰਿਹਾ 
ਤੇਰੀ ਇਕ ਨਜ਼ਰ ਨੂੰ। 

ਚਾਹੁੰਦਾ ਸੀ 
ਤੇਰੀ ਖੁੱਲ੍ਹੀ ਬਾਹਾਂ ਦਾ 
ਸਦਾ ,
ਤੇਰੇ ਮਨ ਚ ਰਹਿਣ ਦਾ 
ਇਸਰਾਰ।

ਪਰ ਤੂੰ ਤਾਂ
ਖੜਾ ਹੀ ਰਿਹਾ
ਉਦਾਸ ਜਿਹਾ,
ਜਿਵੇਂ ਪੱਤਝੜ ਦਾ
ਰੁੱਖ ਹੋਵੇਂ ।










Monday, 7 November 2016

और तुम मुस्कुरा देना

आऊं नज़र तुम्हें 
कभी , तो
नजरें न चुरा लेना...

देख लेना
बस नज़र भर के
और
मुस्कुरा देना...

सोचो तो जरा
कोहरा छा जाने से,
कम तो नहीं हो जाता
सूरज का वजूद ...

दूर हो जाने से
दूर चले जाने से 
कम तो नहीं हो जाता
तुम्हारे होने का अहसास...

बस यही सोच कर
मुझे याद कर के
मुस्कुरा देना....